मलिका-ए-तरन्नुम नूरज़हां का नाम तो आप सभी ने ही सुना होगा और उनके गाये बहुत से गीत भी जरूर सुने होंगे| लताजी के आने के पहले सबसे बड़ी गायिका थीं वे और लताजी को भी अपने शुरुवाती दिनों में उन्हीं के स्टाइल का सहारा लेना पड़ा था| नूरज़हां ने अपना फिल्मी कैरियर पंजाबी फिल्मों से शुरू किया था| गुले बकावली (1939) उनकी पहली पंजाबी फिल्म थी, हीरोइन की भमिका में नहीं बल्कि बेबी नूरज़हां के रूप में|फिल्म गुले बकावली में नूरज़हां को रोल कैसे मिला ये भी एक रोचक किस्सा है| केवल 19 साल की थीं वे उस समय| बचपन से उनका कंठस्वर अत्यंत मधुर था| नूरज़हां के माता-पिता को उनके शुभचिंतक यही राय देते थे कि लड़की को फिल्मों में प्रवेश दिला दो, बहुत नाम पैदा करेगी| नूरज़हां की रुचि भी फिल्मों में काम करने की थी अतः वे रोज लाहौर के पांचोली स्टुडिओ के फाटक के पास जाकर खड़ी हो जाया करती थीं और स्टुडिओ के मालिक दिलसुख एम. पांचोली की गाड़ी के फाटक के पास आते ही गाना गाना शुरू कर देती थीं| कुछ ही दिनों में नूरज़हां की मधुर आवाज ने पांचोली साहब का ध्यान आकृष्ट कर लिया और उन्हें अपनी फिल्म गुले बकावली में भूमिका दे दी| इस पंजाबी फिल्म के संगीतकार थे गुलाम हैदर साहब जिन्होंने नूरज़हां को गाने की तकनीक सिखलाई|
नूरज़हां की पहली हिंदी फिल्म खानदान (1942) थी जिसमें प्राण ने नायक की भूमिका निभाई थी|
देश के विभाजन होने पर नूरज़हां पाकिस्तान चली गईं जहाँ कि उनकी आवाज वर्षों तक गूंजती रही और उन्हें मलिका-ए-तरन्नुम का खिताब मिला|











