किस्सा नूरज़हां के फिल्मों में आने का
Friday, October 13, 2006
मलिका-ए-तरन्नुम नूरज़हां का नाम तो आप सभी ने ही सुना होगा और उनके गाये बहुत से गीत भी जरूर सुने होंगे| लताजी के आने के पहले सबसे बड़ी गायिका थीं वे और लताजी को भी अपने शुरुवाती दिनों में उन्हीं के स्टाइल का सहारा लेना पड़ा था| नूरज़हां ने अपना फिल्मी कैरियर पंजाबी फिल्मों से शुरू किया था| गुले बकावली (1939) उनकी पहली पंजाबी फिल्म थी, हीरोइन की भमिका में नहीं बल्कि बेबी नूरज़हां के रूप में|फिल्म गुले बकावली में नूरज़हां को रोल कैसे मिला ये भी एक रोचक किस्सा है| केवल 19 साल की थीं वे उस समय| बचपन से उनका कंठस्वर अत्यंत मधुर था| नूरज़हां के माता-पिता को उनके शुभचिंतक यही राय देते थे कि लड़की को फिल्मों में प्रवेश दिला दो, बहुत नाम पैदा करेगी| नूरज़हां की रुचि भी फिल्मों में काम करने की थी अतः वे रोज लाहौर के पांचोली स्टुडिओ के फाटक के पास जाकर खड़ी हो जाया करती थीं और स्टुडिओ के मालिक दिलसुख एम. पांचोली की गाड़ी के फाटक के पास आते ही गाना गाना शुरू कर देती थीं| कुछ ही दिनों में नूरज़हां की मधुर आवाज ने पांचोली साहब का ध्यान आकृष्ट कर लिया और उन्हें अपनी फिल्म गुले बकावली में भूमिका दे दी| इस पंजाबी फिल्म के संगीतकार थे गुलाम हैदर साहब जिन्होंने नूरज़हां को गाने की तकनीक सिखलाई|
नूरज़हां की पहली हिंदी फिल्म खानदान (1942) थी जिसमें प्राण ने नायक की भूमिका निभाई थी|
देश के विभाजन होने पर नूरज़हां पाकिस्तान चली गईं जहाँ कि उनकी आवाज वर्षों तक गूंजती रही और उन्हें मलिका-ए-तरन्नुम का खिताब मिला|
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रीमिक्स - दूसरों की संपत्ति पर दिन दहाड़े डाका
Tuesday, October 10, 2006
जी हाँ, एक डाकू क्या करता है? केवल दूसरों की संपत्ति को लूट खसोट कर अपना करार देने के सिवाय वो कुछ कर ही नहीं सकता क्योंकि उसके पास इतनी बुद्धि और योग्याता होती ही नहीं है कि कुछ ऐसा बनाने के लिये कि जिसे वह अपना कह सके| केवल बल होता है उसके पास दूसरों की वस्तुयें लूटने के लिये| और वह करता भी यही है|
आज पुराने गानों का रीमिक्स बनाने वाला भी लुटेरों की श्रेणी का ही व्यक्ति है| उसके भीतर इतनी कल्पनाशीलता तो होती ही नहीं है कि कोई नई यादगार वस्तु का निर्माण कर सके, हाँ, उसके पास शक्ति अवश्य इतनी होती है कि दूसरों की चीजों को लूट ले, और नहीं तो कम से कम विकृत तो अवश्य कर दे|
जरा ध्यान से सोचिये, पुराने लोकप्रिय गीतों की रचना का श्रेय किसी एक व्यक्ति ने कभी भी नहीं लिया क्योंकि वे गीत सामूहिक परिश्रम के परिणाम थे| आज भी यदि आप में से किसी के पास पुराने गीतों के रेकार्ड (लाख या प्लास्टिक का तवा) तो आप उस पर छपे हुये विवरण में पढ़ सकते हैं कि गायक/गायिका - अबस, संगीत निर्देशक - कखग, गीतकार - क्षत्रज्ञ आदि आदि इत्यादि| मेरे कहने का मंतव्य यह है कि एक फिल्मी गीत की संरचना किसी एक व्यक्तिविशेष की नहीं होती|
फिर इतने लोगों के परिश्रम से बनी संरचना को मनमाने रूप में बदल देने का अधिकार किसी को कैसे प्राप्त हो सकता है?
सामान्यतः मैं रीमिक्स नहीं सुना करता परंतु परिस्थितिवश यदा-कदा सुनना ही पड़ जाता है| ऐसी ही परिस्थिति में एक रीमिक्स मुझे सुनाई दे गया जिसमें गाया जा रहा था -
"ये कश्ती वाला, क्या गा रहा था, कोई इसे भी याद आ रहा था"
सुन कर मुझे याद आया कि मूल गाने में "था" शब्द है ही नहीं बल्कि "था" के स्थान पर "है" है| मतलब असली बोल हैं -
"ये कश्ती वाला, क्या गा रहा है, कोई इसे भी याद आ रहा है"
इसी के साथ ही साथ यह भी याद आ गया कि प्रसिद्ध गीतकार शैलेन्द्र ने फिल्म श्री 420 के एक गीत में लिखा था कि -
"रातों दसों दिशाओं में कहेंगी अपनी कहानियाँ.........."
उनके इस गीत पर संगीतकार जयकिशन और गीतकार शैलेन्द्र के बीच जोरदार तकरार हो गया था| जयकिशन का ऐतराज था कि दिशाएँ दस नहीं आठ होती हैं और शैलेन्द्र को शब्द बदलने के लिये दबाव डालने के साथ ही साथ दबाव डलवाने का भी प्रयास किया था| पर शैलेन्द्र अपने बोलों पर अड़े रहे| उन्होंने साफ साफ कह दिया कि तुम्हें धुन बनाने से मतलब होना चाहिये, गीत के बोलों से नहीं| गीत लिखना मेरा काम है और मैं जानता हूँ कि मुझे क्या लिखना है, यदि धुन बना सकते बनाओ अन्यथा किसी और से गीत लिखवा लो|
तात्पर्य यह कि वे गीतकार इतने स्वाभिमानी थे कि अपने लिखे गीत के एक शब्द में जरा भी परिवर्तन सहन नहीं कर पाते थे| (वैसे शैलेन्द्र जी बिल्कुल सही थे क्योंकि हिंदुओं में पृथ्वी और आकाश को भी दिशा ही माना गया है और इस प्रकार से वास्तव में दस दिशायें ही होती हैं|)
तो मेरा प्रश्न यह है कि रीमिक्स बनाने वालों को गाने के ताल को बदलने के साथ ही साथ गीतकार के शब्दों को बदलने का अधिकार किसने दे दिया?
जिन गानों के रीमिक्स आज बन रहे हैं उनके गीतकार, संगीतकार, गायक, री-रेकार्डिंग तकनीशियन आदि में से प्रायः सभी लोगों का स्वर्गवास हो चुका है| जरा सोचिये कि उनकी आत्माओं को शांति के स्थान पर क्या प्रदान कर रहे हैं हम आज?
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साम्राज्य दक्षिण भारतीय सुंदरियों का
Sunday, October 08, 2006
मैं आज की बात तो नहीं कह सकता परंतु यह बात सत्य है कि एक लंबे अंतराल तक भारतीय सिनेमा में दक्षिण भारतीय सुंदरियों का साम्राज्य रहा है यदि आप सन् 1954 से 1968 तक का जमाना याद करेंगे तो आपको स्वयं ही महसूस होगा कि उन दिनों की अधिकतम फिल्मों में हीरोइन केवल वैजयंतीमाला ही रहीं थीं जो कि दक्षिण भारतीय नायिका थीं नागिन, देवदास, नया दौर, मधुमती, अमरदीप, लीडर, ज्वेल थीफ आदि उनकी ऐसी फिल्में हैं जिन्हें
न केवल आज भी याद किया जाता है वरन् बड़े चाव के साथ देखा भी जाता है, और उनके गानों को तो बड़े प्रेम के साथ सुना ही जाता हैं वैजयन्तीमाला के काल में ही दूसरे नंबर की नायिका पद्मिनी थीं और वे भी दक्षिण भारत से ही थीं राजतिलक, जिस देश में गंगा बहती है, आशिक, काजल आदि उनकी प्रमुख फिल्में हैं जो कि आज तक लोकप्रिय हैं
ये बात अलग है कि हेमा मालिनी की पहली फिल्म सपनों का सौदागर (1968) थी जिसमें हेमा मालिनी के हीरो राज कपूर थे, परंतु उनकी इस फिल्म को अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई थी पर यह बात भी सत्य है कि सन् 1969 में फिल्म वारिस के सुपरहिट होने के बाद हेमा मालिनी ने वैजयंतीमाला का स्थान ले लिया फिल्म वारिस, शराफ़त,
अभिनेत्री, जॉनी मेरा नाम, नया जमाना, लाल पत्थर, अंदाज, सीता और गीता, राजा जानी, जुगनू, प्रेम नगर, दुल्हन, दोस्त, सन्यासी, खुशबू, धर्मात्मा, शोले, चरस, महबूबा, किनारा, कुदरत, क्रांति, नसीब और भी न जाने कितने फिल्मों को कोई कैसे भूल सकता है? लोग उन्हें स्वप्न सुंदरी के नाम से जानने लगे बाद में फिल्मों में काम यदा कदा ही करने के उनके निश्चय कर लेने के कारण उनका जो स्थान रिक्त हुआ उसे रेखा ने ले लिया रेखा भी दक्षिण भारत से आई थीं
कालान्तर में दक्षिण भारतीय अभिनेत्री श्रीदेवी नंबर वन हो गईं श्रीदेवी के साथ ही साथ दक्षिण की ही जयाप्रदा भी छाई रहीं सुंदरता के साथ ही साथ ये अभिनेत्रियाँ अथक परिश्रम भी करती रही हैं विशेषकर उत्तर भारतीय भाषाओं
को सीखने के लिये, चरित्र (रोल) के अनुसार भोजपुरी, बिहारी शैली में संवाद बोलने में भी वे सफल रही हैं दक्षिण से आकर हिंदीभाषी दर्शकों को भी मोह कर अपना प्रशंसक बना लेना कोई आसान काम नहीं है जिसे कि वे करती रही हैं शायद यही सबसे बड़ा कारण रहा हो उनके सदैव शीर्ष में रहने की
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अशोक कुमार आखिर हीरो कैसे बने
Saturday, October 07, 2006
कुमुदलाल कांजीलाल गांगुली बांबे स्टुडिओ के प्रयोगशाला सहायक (laboratory assistant) थे| उन ही दिनों में नज़ाम-उल-हुसैन बांबे टाकीज के हीरो हुआ करते थे और नायिका होती थीं देविकारानी जो कि बांबे टाकीज के मालिक हिमांशु राय की पत्नी थीं| किस्सा यों है कि बांबे टाकीज में फिल्म जीवन नैया बन रही थी और फिल्म में हीरो (नज़ाम-उल-हुसैन) हीरोइन (देविका रानी) को फिल्म की कहानी में भगाने के स्थान पर सचमुच ही भगा ले गये| हिमांशु राय भी कम न थे, खोजबीन करवा के दोनों को पकड़ मंगवाया| देविकारानी को तो क्षमा कर दिया उन्होंने पर नज़ाम-उल-हुसैन को बांबे टाकीज से निकाल बाहर कर दिया| अब समस्या यह थी कि हीरो कहाँ से लायें? अचानक उनके जेहन में बिजली सी कौंधी| प्रयोगशाला सहायक कुमुदलाल कांजीलाल गांगुली नौजवान भी है और खूबसूरत भी, हीरो का रोल अवश्य फब जायेगा उसे| आदेश दे दिया उसे कि हीरो का रोल करो| बेचारे कुमुदलाल ने बहुत कहा कि मुझे अभिनय का क ख ग भी नहीं आता पर उनकी एक न चली, नौकरी जो करनी थी| कुमुदलाल का फिल्मी नाम भी रख दिया हिमांशुराय ने - फिल्मी नाम था अशोक कुमार| फिल्म बनी और चली भी, ये बात अलग है कि फिल्म देविकारानी की वजह से ही चली पर अशोक कुमार बन गये हीरो| तो हुज़ूर जिसके किस्मत में हीरो बनना लिखा होता है उसे बनना ही पड़ता है|
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हिंदी फिल्म - विदेशी कथावस्तु
Wednesday, September 27, 2006

फिल्म मदर इंडिया (1957) तो जरूर देखी होगी आपने| अपने जमाने की मशहूर फिल्म थी| कहानी ली गई थी Maxim Gorky के विख्यात उपन्यास Mother से| भारतीय रूपांतरण बड़ी दक्षता के साथ किया गया था| ये फिल्म मेहबूब ख़ान की अपनी ही फिल्म औरत (1940) के रीमेक थी|
और भी कई फिल्में बनी हैं विदेशी कहानी एवं उपन्यास के आधार पर| पर उनमें से कुछ फिल्में इतनी अच्छी बनी हैं कि दर्शक को फिल्म कहीं कुछ भी विदेशी जैसा नहीं लगता| हेमंत कुमार द्वारा बनाई पुरानी फिल्म बीस साल बाद (1962) तो अवश्य देखी होगी आपने| लगा कभी आपको उसमें कु विदेशी जैसा? आपको पता ही होगा कि वो फिल्म Sir Arthur Conan Doyle की कहानी The Hound Of The Baskervilles पर आधारित थी| निर्देशक बिरेन नाग की तारीफ करनी पड़ेगी विदेशी कथा को इतने सुंदर भारतीय रूप में प्रस्तुत करने के लिये| और हाँ अपने समय की सबसे अधिक डरावनी फिल्म थी वो|
बिमल राय ने प्रसिद्ध नाटककार William Shakespeare के नाटक Comedy of Errors पर आधारित हास्य फिल्म दो दूनी चार (1968) बनाई थी| किशोर कुमार और असित सेन दोनों के ही डबल रोल थे उस फिल्म में| सन् 1982 में गुलज़ार ने भी फिल्म अंगूर बनाई थी, इस बार संजीव कुमार और देवेन वर्मा डबल रोल में थे| दोनों ही बार कथा का भारतीयकरण इतने सुंदर ढंग से किया गया था कि कहीं भी किसी प्रकार का विदेशीपन नहीं झलकता|
मेरे अपने विचार से तो सबसे अच्छा भारतीयकरण हुआ है Eric Segal के उपन्यास Man, Woman, and Child का शेखर कपूर के फिल्म मासूम (1983) में| भारतीय रूप देने के लिये शेखर कपूर ने उपन्यास के क्लाइमेक्स को ही बदल दिया और बालक को अपना कर परिवार का सदस्य बना दिया जबकि असली उपन्यास में बालक को अपनाया ही नहीं गया है|श्री अनूप भार्गव की टिप्पणी से साभार -
"विदेशी कथावस्तु पर बनी फ़िल्मों की चर्चा में 'परिचय' का नाम कैसे भूला जा सकता है ?
गुलज़ार साहब नें Sound of Music का बहुत ही सुन्दर रूपान्तर किया था - भारतीय परिवेश को ले कर"
पुनश्चः
उन्मुक्त जी के टिप्पणी के अनुसार फिल्में "दो कलियें" और "अकेले हम अकेले तुम" भी विदेशी कथावस्तु पर आधारित हैं|
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पद्मिनी - एक श्रद्धांजलि
Tuesday, September 26, 2006

फिल्म मेरा नाम जोकर की मीनू मास्टर, पुराने जमाने की फिल्म हीरोइन पद्मिनी, का कल रात हृदय गति रुक जाने के कारण स्वर्गवास हो गया| पद्मिनी ने राज कपूर, देव आनंद, धर्मेंद्र, एम.जी. रामचन्द्रन, शिवाजी गणेशन जैसे मशहूर सितारों के साथ काम किया था| पद्मिनी की अन्य दो बहनों, ललिता और रागिनी ने भी चलचित्र जगत में धूम मचाई है| नृत्यकला में अत्यंत निपुण थीं पद्मिनी जी, चार साल की उम्र से ही शास्त्रीय नृत्य की शिक्षा लेना प्रारंभ कर दिया था उन्होंने| जिस देश में गंगा बहती है, संगम, काजल जैसी अविस्मरणीय फिल्मों में नायिका की भूमिका सफलता पूर्वक निभाई उन्होंने| डॉ. के.टी. रामचन्द्रन के साथ विवाह करने के बाद फिल्मों में काम करना छोड़ दिया उन्होंने और न्यू जर्सी में जा बसीं अपने पति के साथ| पद्मिनी फाइन आर्टस के नाम से एक स्कूल भी खोला उन्होंने वहाँ पर| सन् 1981 में पति के देहावसान हो जाने के बाद वे वापस भारत चलीं आई और तमिल फिल्मों में फिर एक बार अभिनय भी किया| बीते शनिवार को वे मुख्यमंत्री करुणानिधि के साथ एक आम सभा में नजर आई थीं वे आखरी बार| उनके इकलौते पुत्र के अमेरिका से भारत आ जाने के बाद ही उनका अंतिम संस्कार हो पायेगा|
निःसंदेह जब कभी भी जिस देश में गंगा बहती है, संगम, काजल जैसी फिल्मों का नाम आयेगा पद्मिनी की याद अवश्य आयेगी| आइये, आज हम आज महान कलाकारा पद्मिनी को स्मरण करते हुये प्रार्थना करें कि ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे|
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शैलेन्द्र - संवेदनशील गीतकार
Monday, September 25, 2006
"के मर के भी किसी को याद आयेंगे
किसी के आँसुओं में मुस्कुरायेंगे
कहेगा फूल हर कली से बार बार
जीना इसी का नाम है....."
(फिल्म अनाड़ी)
सरल और सटीक शब्दों में भावनाओं और संवेदनाओं को अभिव्यक्त कर देना शैलेन्द्र जी की महान विशेषता थी| किसी के आँसुओँ में मुस्कुराने जैसा विचार केवल शैलेन्द्र जैसे गीतकार के संवेदनशील हृदय में आ सकता है| उनकी संवेदना का एक और उदाहरण देखिये -
"कल तेरे सपने पराये भी होंगे लेकिन झलक मेरे आँखों में होगी
फूलों की डोली में होगी तू रुखसत, लेकिन महक मेरे साँसों में होगी....."
(फिल्म ब्रम्हचारी)
शायद उनके लिखे ये शब्द आपके भी हृदय को छू लेती होगी -
"तेरे मेरे दिल के बीच अब तो सदियों के फासले हैं
यकीन होगा किसे के हम तुम इक राह संग चले हैं....."
(फिल्म गाइड)
शायद कभी प्यार की राह में कभी ऐसे गिरे रहे होंगे वे कि फिर कभी संभल नहीं पाये| इसीलिये वे लिखते हैं
"सहज है सीधी राह पे चलना
देख के उलझन, बच के निकलना
कोई ये चाहे माने न माने
बहुत है मुश्किल गिर के संभलना....."
(फिल्म जिस देश में गंगा बहती है)
कितने सुंदर ढंग से दर्शा देते हैं वे कि दिल बिक भी सकता है और धड़क भी सकता है -
"उस देश में, तेरे परदेश में सोने चांदी के बदले में बिकते हैं दिल
इस गाँव में, दर्द के छाँव में प्यार के नाम पर ही धड़कते हैँ दिल....."
(फिल्म श्री 420)
फिल्मों में गीत लिखने के पहले देश के आजादी की लड़ाई में योगदान देने का उनका एक अलग ही तरीका रहा है| वे उस समय देशभक्ति से सराबोर वीररस की कविताएँ लिखा करते थे और उन्हें जोशोखरोश के साथ सुनाकर सुनने वालों को देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत कर दिया करते थे, परिणामस्वरूप देश के आजादी के वीरों का बहुत अधिक उत्साहवर्धन होता था| उनकी रचना 'जलता है पंजाब......' ने उन दिनों बहुत प्रसिद्धि पाई| फिल्मों मेँ आने के बाद भी उनका ये ज़ज़्बा बना ही रहा इसीलिये वे गरीब भारतीय की अभिव्यक्ति इन शब्दों में करते हैँ -
"मेरा जूता है जापानी, ये पतलून इंग्लिस्तानी
सर पे लाल टोपी रूसी, फिर भी दिल है हिंदुस्तानी....."
(फिल्म श्री 420)
एक हिंदुस्तानी स्त्री की भावनाओं का कितना सुंदर प्रदर्शन करते हैं वे अपने इस गीत मेँ -
"तन सौंप दिया, मन सौंप दिया, कुछ और तो मेरे पास नहीँ
जो तुम से है मेरे हमदम, भगवान से भी वो आस नहीँ....."
(फिल्म संगम)
ग्लैमर की दुनिया में रहकर भी दौलत इकट्ठा न कर पाये कभी| सीधे सच्चे इंसान थे वे, होशियारी कभी सीख ही न सके| उनके ही शब्दों में -
"सब कुछ सीखा हमने, ना सीखी होशियारी
सच है दुनिया वालों, के हम हैं अनाड़ी....."
(फिल्म अनाड़ी)
काल के गाल में एक दिन जाना तो सभी को होता है पर शैलेन्द्र जैसे गीतकार के चले जाने से भारतीय सिनेमा में आया खालीपन कभी भी न भर पायेगा| ये जानते हुये भी कि उनके लिखे इन शब्दों का सच होना असंभव है, चलिये एक बार दुहरा लेते हैं उनके उन असंभव शब्दों को -
"ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना....."
(फिल्म बंदिनी)
posted by जुड़िये गँठजोड़ मित्र समुदाय से! (gathjod.com) @ 9:17 AM,
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