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रीमिक्स - दूसरों की संपत्ति पर दिन दहाड़े डाका

जी हाँ, एक डाकू क्या करता है? केवल दूसरों की संपत्ति को लूट खसोट कर अपना करार देने के सिवाय वो कुछ कर ही नहीं सकता क्योंकि उसके पास इतनी बुद्धि और योग्याता होती ही नहीं है कि कुछ ऐसा बनाने के लिये कि जिसे वह अपना कह सके| केवल बल होता है उसके पास दूसरों की वस्तुयें लूटने के लिये| और वह करता भी यही है|

आज पुराने गानों का रीमिक्स बनाने वाला भी लुटेरों की श्रेणी का ही व्यक्ति है| उसके भीतर इतनी कल्पनाशीलता तो होती ही नहीं है कि कोई नई यादगार वस्तु का निर्माण कर सके, हाँ, उसके पास शक्ति अवश्य इतनी होती है कि दूसरों की चीजों को लूट ले, और नहीं तो कम से कम विकृत तो अवश्य कर दे|

जरा ध्यान से सोचिये, पुराने लोकप्रिय गीतों की रचना का श्रेय किसी एक व्यक्ति ने कभी भी नहीं लिया क्योंकि वे गीत सामूहिक परिश्रम के परिणाम थे| आज भी यदि आप में से किसी के पास पुराने गीतों के रेकार्ड (लाख या प्लास्टिक का तवा) तो आप उस पर छपे हुये विवरण में पढ़ सकते हैं कि गायक/गायिका - अबस, संगीत निर्देशक - कखग, गीतकार - क्षत्रज्ञ आदि आदि इत्यादि| मेरे कहने का मंतव्य यह है कि एक फिल्मी गीत की संरचना किसी एक व्यक्तिविशेष की नहीं होती|

फिर इतने लोगों के परिश्रम से बनी संरचना को मनमाने रूप में बदल देने का अधिकार किसी को कैसे प्राप्त हो सकता है?

सामान्यतः मैं रीमिक्स नहीं सुना करता परंतु परिस्थितिवश यदा-कदा सुनना ही पड़ जाता है| ऐसी ही परिस्थिति में एक रीमिक्स मुझे सुनाई दे गया जिसमें गाया जा रहा था -

"ये कश्ती वाला, क्या गा रहा था, कोई इसे भी याद आ रहा था"

सुन कर मुझे याद आया कि मूल गाने में "था" शब्द है ही नहीं बल्कि "था" के स्थान पर "है" है| मतलब असली बोल हैं -

"ये कश्ती वाला, क्या गा रहा है, कोई इसे भी याद आ रहा है"

इसी के साथ ही साथ यह भी याद आ गया कि प्रसिद्ध गीतकार शैलेन्द्र ने फिल्म श्री 420 के एक गीत में लिखा था कि -

"रातों दसों दिशाओं में कहेंगी अपनी कहानियाँ.........."

उनके इस गीत पर संगीतकार जयकिशन और गीतकार शैलेन्द्र के बीच जोरदार तकरार हो गया था| जयकिशन का ऐतराज था कि दिशाएँ दस नहीं आठ होती हैं और शैलेन्द्र को शब्द बदलने के लिये दबाव डालने के साथ ही साथ दबाव डलवाने का भी प्रयास किया था| पर शैलेन्द्र अपने बोलों पर अड़े रहे| उन्होंने साफ साफ कह दिया कि तुम्हें धुन बनाने से मतलब होना चाहिये, गीत के बोलों से नहीं| गीत लिखना मेरा काम है और मैं जानता हूँ कि मुझे क्या लिखना है, यदि धुन बना सकते बनाओ अन्यथा किसी और से गीत लिखवा लो|

तात्पर्य यह कि वे गीतकार इतने स्वाभिमानी थे कि अपने लिखे गीत के एक शब्द में जरा भी परिवर्तन सहन नहीं कर पाते थे| (वैसे शैलेन्द्र जी बिल्कुल सही थे क्योंकि हिंदुओं में पृथ्वी और आकाश को भी दिशा ही माना गया है और इस प्रकार से वास्तव में दस दिशायें ही होती हैं|)

तो मेरा प्रश्न यह है कि रीमिक्स बनाने वालों को गाने के ताल को बदलने के साथ ही साथ गीतकार के शब्दों को बदलने का अधिकार किसने दे दिया?

जिन गानों के रीमिक्स आज बन रहे हैं उनके गीतकार, संगीतकार, गायक, री-रेकार्डिंग तकनीशियन आदि में से प्रायः सभी लोगों का स्वर्गवास हो चुका है| जरा सोचिये कि उनकी आत्माओं को शांति के स्थान पर क्या प्रदान कर रहे हैं हम आज?

posted by जुड़िये गँठजोड़ मित्र समुदाय से! (gathjod.com) @ 8:07 PM,

1 Comments:

At 11:15 PM, Anonymous Anonymous ने कहा...

रिमेक्स सुन कर वाकई बड़ी पीड़ा होती है। कितना पसीना बहा बहा कर किन भाcअनाओं के साथ यह मूल गीत बनाये गये होंगे। पल भर में वह सारी भावनायें और संवेदनायें नोट छपने वाली मशीन में पीस दी जाती हैं।

इसी विषय पर मेरा व्यंग पढ़िये "होत चीकने पात"

http://pagdamdi.blogspot.com

 

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