शंकर पृथ्वी थियेटर्स में तबला वादक का काम करते थे| जयकिशन बंबई (अब मुंबई) आये थे हीरो बनने के लिये| एक निर्देशक के आफिस में मुलाकात हुई दोनों की और मुलाकात दोस्ती में बदल गई| शंकर ने जयकिशन को भी पृथ्वी थियेटर्स में काम दिलवा दिया| उन दिनों पृथ्वी थियेटर्स के संगीतकार हुस्नलाल भगतराम हुआ करते थे| शंकर और जयकिशन की प्रतिभा से प्रभावित होकर हुस्नलाल भगतराम ने उन्हें अपना सहायक बना लिया|शंकर और जयकिशन दोनों ही दोस्त की आकांक्षा थी संगीत निर्देशक बनने की| दोनों दिन में अपनी नौकरी निभाते थे और रात को हारमोनियम तबला लेकर बैठ जाते थे धुनें बनाने| कई प्यारी धुनें बना ली थीं उन्होंने और चाहते थे कि किसी निर्देशक को अपनी धुनें सुनाये ताकि उन्हें संगीत निर्देशन का काम मिल सके पर निर्देशकों तक पहुँच नहीँ थी उन दोनों की|
सन 1947 में राज कपूर साहब ने अपनी फिल्म आग बनाई| आग के संगीत निर्देशक थे राम गांगुली| उस समय शंकर जयकिशन राम गांगुली के सहायक हुआ करते थे| इसी दौरान उन्होंने राज साहब से उनकी धुनों को सुन लेने का अनुरोध किया| राज साहब ने उन्हें समय तो कई बार दिया पर अति व्यस्त होने के कारण उनकी धुनों को एक भी बार सुन नहीं पाये| हर बार फिर समय दे दिया करते थे| ये दोनों भी दिये गये समय पर फिर उपस्थित हो जाते थे पर हर बार एक नया समय दे दिया जाता था|
आग बन जाने के बाद राज साहब बरसात बनाने की घोषणा कर दी| फिल्म बरसात में राम गांगुली को ही संगीत निर्देशन का कार्य देने का निश्चय था उनका| हाँ तो इस घोषणा के बाद वे अपने आफिस में बैठे थे कि पहुँच गये शंकर और जयकिशन उनके पास, क्योंकि समय दिया गया था उन्हें| इस बार राज साहब ने उनके लिये समय निकाला यह कहते हुये कि चलो एकाध धुन जल्दी से सुना दो क्योंकि अधिक समय नहीं है मेरे पास तुम दोनों के लिये| पहली ही धुन ने राज साहब पर ऐसा जादू चलाया कि सारे काम छोड़कर उनकी सारी धुनें सुनीं और राम गांगुली की जगह पर उन दोनों को संगीत निर्देशन का काम दे दिया| शायद आप भी जानते होंगे कि वो पहली धुन कौन सी थी जिसने राज साहब को मोह लिया, जी हाँ ये वही धुन थी जिस पर 'हवा में उड़ता जाये......' गाना बनाया गया| आपको भी पसंद आता है न आज भी ये गीत!



2 comments:
पुरानी यादें ताजा करने का धन्यवाद
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