Site Network: हिंदी वेबसाइट | वाल्मीकि रामायण | हिंदी तथा अंग्रेजी व्याकरण | आइये कम्प्यूटर सीखें!

 



साहिर लुधियानवी - लफ्ज़ों के जादूगर


एक ही विचार को दो अलग अलग भावों में व्यक्त करने की कला बहुत अच्छी तरह से जानते थे साहिर साहब| जहाँ उन्होंने आशावादी रूप में लिखा हैः

वो सुबह हमीं से आयेगी

जब धरती करवट बदलेगी, जब क़ैद से क़ैदी छूटेंगे
जब पाप घरौंदे फूटेंगे, जब ज़ुल्म के बन्धन टूटेंगे
उस सुबह को हम ही लायेंगे, वो सुबह हमीं से आयेगी
वो सुबह हमीं से आयेगी

मनहूस समाजों ढांचों में, जब जुर्म न पाले जायेंगे
जब हाथ न काटे जायेंगे, जब सर न उछाले जायेंगे
जेलों के बिना जब दुनिया की, सरकार चलाई जायेगी
वो सुबह हमीं से आयेगी

संसार के सारे मेहनतकश, खेतो से, मिलों से निकलेंगे
बेघर, बेदर, बेबस इन्सां, तारीक बिलों से निकलेंगे
दुनिया अम्न और खुशहाली के, फूलों से सजाई जायेगी
वो सुबह हमीं से आयेगी

वहीं वे अपने उसी गीत को कैसे निराशावादी रूप दे देते हैः

वो सुबह कभी तो आयेगी

इन काली सदियों के सर से, जब रात का आंचल ढलकेगा
जब दुख के बादल पिघलेंगे, जब सुख का सागर छलकेगा
जब अम्बर झूम के नाचेगा, जब धरती नज़्में गायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

जिस सुबह की खातिर जुग-जुग से, हम सब मर-मर कर जीते हैं
जिस सुबह के अमृत की धुन में, हम जहर के प्याले पीते हैं
इन भूखी प्यासी रूहों पर, इक दिन तो करम फर्मायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

माना कि अभी तेरे मेरे, अर्मानों की कीमत कुछ भी नहीं
मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर, इन्सानों की कीमत कुछ भी नहीं
इन्सानों की इज्जत जब झूठे, सिक्कों में न तोली जायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

दौलत के लिये जब औरत की, इस्मत को न बेचा जायेगा
चाहत को न कुचला जायेगा, ग़ैरत को न बेचा जायेगा
अपनी काली करतूतों पर, जब ये दुनिया शर्मायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

बीतेंगे कभी तो दिन आख़िर, ये भूख के और बेकारी के
टूटेंगे कभी तो बुत आख़िर, दौलत की इजारादारी के
जब एक अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाई जायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

मजबूर बुढ़ापा जब सूनी, राहों की धूल न फांकेगा
मासूम लड़कपन जब गंदी, गलियों भीख न मांगेगा
ह़क मांगने वालों को जिस दिन, सूली न दिखाई जायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

फ़ाको की चिताओं पर जिस दिन, इन्सां न जलाये जायेंगे
सीनों के दहकते दोज़ख में, अर्मां न जलाये जायेंगे
ये नरक से भी गन्दी दुनिया, जब स्वर्ग बनाई जायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

अब आपको यह बताने की जरूरत तो नहीं होगी कि यह फिल्म फिर सुबह होगी का वही अमर गीत है जो आज तक लोकप्रिय है|

posted by जुड़िये गँठजोड़ मित्र समुदाय से! (gathjod.com) @ 8:13 PM,

2 Comments:

At 10:57 PM, Blogger Sagar Chand Nahar ने कहा...

बहुत खूब अवधिया जी

 
At 3:28 PM, Blogger अनूप भार्गव ने कहा...

इस जानकारी को बाँटने के लिये धन्यवाद । कुछ इसी तरह का जादू ’साहिर साहब’ नें फ़िल्म ’कभी कभी’ के इन दो गीतों में पिरोया था :

"मैं पल दो पल का शायर हूँ"
और
"मैं हर इक पल का शायर हूँ"

दूसरा गीत शायद फ़िल्म में नहीं प्रयोग किया गया था लेकिन उपलब्ध है ।

 

Post a Comment

<< Home