इसी प्रकार घोड़े की टाप को ताल का रूप देने का श्रेय संगीतकार ओ.पी. नैयर को जाता है| याद कीजिये फिल्म नया दौर के गीत 'मांग के साथ तुम्हारा.....' और फिल्म फिर वही दिल लाया हूँ के गीत 'बंदा परवर थाम लो जिगर....' को| इन गानों में ताल के रूप में गूँजती हुई घोड़े की टापों की आवाज कितनी कर्णप्रिय लगती है|
सबसे अधिक विभिन्न प्रकार के विचित्र तालों का प्रयोग करने वाले संगीतकार हैं आर.डी. बर्मन| उदाहरण के लिये तनिक गौर से सुनकर देखियेगा फिल्म पड़ोसन का गाना 'मेरे सामने वाली खिड़की में इक चांद का टुकड़ा रहता है.....' को, ताल सुनकर झूम उठेंगे आप पर उसमें एक प्रकार की विचित्रता का भी अनुभव होगा| पंचम दा ने पश्चिम के वाद्ययंत्रों को इस्तेमाल करके भारतीय संगीत की रचना करने का बड़ा ही मधुर और सफल प्रयोग किया है| फिल्म अमर प्रेम का गाना 'रैना बीत जाये.....' पूर्णतः शास्त्रीय संगीत पर आधारित है पर इस गाने में प्रायः पश्चिम के साजों का ही उपयोग किया गया है|टीपः
अपनी टिप्पणी में मनीष जी बहुत अच्छी जानकारी दी है| सभी के ज्ञानवर्धन के लिये मैं उनकी टिप्पणी को अक्षरशः प्रस्तुत कर रहा हूँ
"वैसे रेलगाड़ी की सीटी याद दिला जाती है पंचम दा के खुद के गाये हुए गाने धन्नो की आँखो में की।
और पिछले साल बंटी और बबली में गुलजार के गीत धड़क धड़क धुआँ उड़ाए रे ने फिर रेलगाड़ी की सीटी का बखूबी इस्तेमाल किया था।"
जानकारी में इजाफा के लिये मैं मनीष जी का शुक्रगुज़ार हूँ|



2 comments:
वैसे रेलगाड़ी की सीटी याद दिला जाती है पंचम दा के खुद के गाये हुए गाने धन्नो की आँखो में की।
और पिछले साल बंटी और बबली में गुलजार के गीत धड़क धड़क धुआँ उड़ाए रे ने फिर रेलगाड़ी की सीटी का बखूबी इस्तेमाल किया था ।
घोडे की टाप से याद आया कि मेरी मित्र मंडली मे ओ पी नैयर घोडेवाला के नाम से जाने जाते है :)
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